गोलमाल है भई सब गोलमाल है!



अनजान जी एक रिटायर्ड सरकारी क्लर्क थे जो अपनी सभी ज़िम्मेदारियों से मुक्त हो चुके थे।और अब चीज़ों में नुख़्स निकालने के पद पर कार्यरत थे। अब इसमें उनकी भी कोई ख़ास ग़लती नहीं थी, कभी-कभी बुढ़ापे की मियाद में दाखिल होते समय कुछ कीटाणु बाक़ी ज़िन्दगी के लिए साथ हो लेते हैं। अनजान जी भी इन्हीं कीटाणुओं से ग्रसित हो गए। और जब कीटाणु हैं तो ज़ाहिर है कि बीमारी भी होगी। और बीमारी भी लगी तो नुख़्स निकालने की। और जब बीमारी है तो लक्षण भी होंगे, और लक्षण थे किसी भी बात पर घंटों चर्चा करना, उनकी ख़ामियों को जब तक सामने निकाल कर पेश नहीं कर देते, तब तक अनजान जी चुप नहीं होते थे। मानो जैसे अनजान जी अब ख़ामियां निकालने में Ph.D हासिल कर चुके थे। अब बातें करने के लिए माहौल भी चाहिए था, क्या करें बीमारी ही जो ऐसी लगी थी। और  घर में तो धर्म पत्नी के अलावा और कोई था नहीं, तो ज़्यादातर समय अपने साथियों के साथ बाहर ही बिताते थे। पत्नी के सामने बहस करने में हर मर्द की तरह वो भी नतमस्तक थे। गप शप करने के चस्के के साथ-साथ उन्हें अपने संघ में सबसे होशियार भी दिखना था इसीलिए पहले सुबह जल्दी उठकर जल्दी से अख़बार की सारी ख़बरें मानो अपने दिमाग़ में स्कैन कर लेते और हर सुबह सैर पर निकल जाते और सार्वजनिक पार्क में अपने दोस्तों को सबसे मनोरंजक ख़बरों के बारे में बताते। अनजान जी का मित्रगण भी उनसे पीछे नहीं था, वह भी बहस में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने के लिए रोज़ अपनी कमर कस कर आते। हफ़्ते में एक बार संघ के हर एक सदस्य की सभी के लिए चाय लाने की ज़िम्मेदारी थी, और आज अनजान जी की बारी थी। तो आज अनजान जी अपने साथ एक हाथ में एक केतली चाय और एक हाथ में अख़बार लिए निकल पड़े पार्क के लिए। संघ के सदस्य मुद्दा कोई भी उठाएं, लेकिन घूम फिर कर उनकी ख़ामियां निकालने की सुईं सरकार और भ्रष्टाचार पर ही आकर रुकती थी। घर के गैस सिलेंडर में पानी की मिलावट पायी... तो सरकार की ग़लती, भारत क्रिकेट मैच हार गया ... तो सरकार की ग़लती, किसी की बीवी पड़ोसी के साथ भाग गयी ... तो सरकार की ग़लती ...

मेरे इस कथन से यह अनुमान मत लगाइएगा कि मैं सरकार की तरफ़ से कुछ कह रहा हूँ, बल्कि मैं सिक्के के दूसरे पहलू की तरफ़ से कुछ दर्शाने की कोशिश कर रहा हूँ। तो, अनजान जी बड़े ही उत्साह से पार्क में पहुंचे और सब को चाय परोसी। चाय परोसने के दौरान दशहरे की बात छिड़ गयी और बात होते-होते दिल्ली तक पहुँच ही गयी। और अनजान जी तनतनाते हुए बोले,"अजी अब सड़कों को ही देख लीजिये ना!... एक बारिश ढंग से नहीं देख पाती हैं, बस कॉन्ट्रैक्टरों और नेताओं के बैंक बैलेंस देश की आबादी से भी तेज़ बढ़ते जा रहे हैं।“ सभी ने यह बात सुन कर ठहाके लगाए, इससे अनजान जी के उत्साह को और ईंधन मिला और उन्होंने जोश-जोश में कहा,"भ्रष्टाचारियों को तो बिना सुनवाई के जेल में डाल देना चाहिए!" यह बात उन्ही अनजान जी ने बोली थी जिन्होंने कल ही सिगनल पर रेड लाइट तोड़ी थी और ट्रैफ़िक पुलिस के रोकने पर भारी चालान से बचने के लिए सौ रुपयों से ट्रैफ़िक हवलदार का परिचय करवाया था।
"बिलकुल सही कहा अनजान साब! जब तक इस देश में भ्रष्टाचारी हैं, तब तक इस देश का उद्धार हो ही नहीं सकता!" यह बोलकर अनजान जी का समर्थन किया अज्ञात जी ने जो कि अपने बेटे का एडमिशन पूरे दस लाख रूपये डोनेशन के रूप में प्रदान कर डॉक्टरी के कॉलेज में पिछले महीने ही करवा कर आये थे। और बेग़ाना जी, वह भी कहाँ पीछे रहने वाले थे, उन्होंने भी बहस की विस्तृति के लिए उसमें अपना योगदान दिया और एक पंक्ति जोड़ दी और कहा,"अरे कितना ज़्यादा क्राइम बढ़ गया है?! गलियों तक में औरतों के गलों में से चैनों की छीना-झपटी हो रही है!" और बेग़ाना जी के तो कहने ही क्या! सब्ज़ी-तरकारी खरीदते समय लगभग रोज़ सब्ज़ी वाले से नज़र बचाते हुए कभी एक लौकी, तो कभी कद्दू पार कर लेते थेऔर अगर किसी दुकान पर भीड़ मिल जाए तो सोने पर सुहागा! उस दिन तो सब्ज़ियां तुलवाकर, झोले में डाल कर ऐसे छू-मंतर होते थे, जैसे गधे के सर पर से सींग!

दरअसल यह ही नहीं, समाज में कई अनजान जी, अज्ञात जी और बेग़ाना जी हैं जो चाहते हैं कि उन्हें कभी भ्रष्टाचार का सामना ना करना पड़े, लेकिन ख़ुद वह भ्रष्टाचार के झूले से नहीं उतरना चाहते, वह उसे झूलते रहना  चाहते हैं और उसका आनंद लेते रहना चाहते हैं और वह भी हमेशा के लिए। और मज़े की बात तो यह है कि ऐसे छोटी-मोटी गड़बड़ियों को वह भ्रष्टाचार मानते ही नहीं हैं। लेकिन जब कि असल बात तो यह है कि भ्रष्टाचार घर से ही शुरू होता है और अगर इसे रोकना है तो हमें ख़ुद को बदलना होगा। 

समाप्त

 

Written by: Gunjan Kain

Image Courtesy: Pixabay (Artist – Clker)


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