गोलमाल है भई सब गोलमाल है!
मेरे इस कथन से यह अनुमान मत लगाइएगा कि मैं सरकार की तरफ़ से कुछ कह रहा हूँ, बल्कि मैं सिक्के के दूसरे पहलू की तरफ़ से कुछ दर्शाने की कोशिश कर रहा हूँ। तो, अनजान जी बड़े ही उत्साह से पार्क में पहुंचे और सब को चाय परोसी। चाय परोसने के दौरान दशहरे की बात छिड़ गयी और बात होते-होते दिल्ली तक पहुँच ही गयी। और अनजान जी तनतनाते हुए बोले,"अजी अब सड़कों को ही देख लीजिये ना!... एक बारिश ढंग से नहीं देख पाती हैं, बस कॉन्ट्रैक्टरों और नेताओं के बैंक बैलेंस देश की आबादी से भी तेज़ बढ़ते जा रहे हैं।“ सभी ने यह बात सुन कर ठहाके लगाए, इससे अनजान जी के उत्साह को और ईंधन मिला और उन्होंने जोश-जोश में कहा,"भ्रष्टाचारियों को तो बिना सुनवाई के जेल में डाल देना चाहिए!" यह बात उन्ही अनजान जी ने बोली थी जिन्होंने कल ही सिगनल पर रेड लाइट तोड़ी थी और ट्रैफ़िक पुलिस के रोकने पर भारी चालान से बचने के लिए सौ रुपयों से ट्रैफ़िक हवलदार का परिचय करवाया था।
"बिलकुल सही कहा अनजान साब! जब तक इस देश में भ्रष्टाचारी हैं, तब तक इस देश का उद्धार हो ही नहीं सकता!" यह बोलकर अनजान जी का समर्थन किया अज्ञात जी ने जो कि अपने बेटे का एडमिशन पूरे दस लाख रूपये डोनेशन के रूप में प्रदान कर डॉक्टरी के कॉलेज में पिछले महीने ही करवा कर आये थे। और बेग़ाना जी, वह भी कहाँ पीछे रहने वाले थे, उन्होंने भी बहस की विस्तृति के लिए उसमें अपना योगदान दिया और एक पंक्ति जोड़ दी और कहा,"अरे कितना ज़्यादा क्राइम बढ़ गया है?! गलियों तक में औरतों के गलों में से चैनों की छीना-झपटी हो रही है!" और बेग़ाना जी के तो कहने ही क्या! सब्ज़ी-तरकारी खरीदते समय लगभग रोज़ सब्ज़ी वाले से नज़र बचाते हुए कभी एक लौकी, तो कभी कद्दू पार कर लेते थेऔर अगर किसी दुकान पर भीड़ मिल जाए तो सोने पर सुहागा! उस दिन तो सब्ज़ियां तुलवाकर, झोले में डाल कर ऐसे छू-मंतर होते थे, जैसे गधे के सर पर से सींग!
दरअसल यह ही नहीं, समाज में कई अनजान जी, अज्ञात जी और बेग़ाना जी हैं जो चाहते हैं कि उन्हें कभी भ्रष्टाचार का सामना ना करना पड़े, लेकिन ख़ुद वह भ्रष्टाचार के झूले से नहीं उतरना चाहते, वह उसे झूलते रहना चाहते हैं और उसका आनंद लेते रहना चाहते हैं और वह भी हमेशा के लिए। और मज़े की बात तो यह है कि ऐसे छोटी-मोटी गड़बड़ियों को वह भ्रष्टाचार मानते ही नहीं हैं। लेकिन जब कि असल बात तो यह है कि भ्रष्टाचार घर से ही शुरू होता है और अगर इसे रोकना है तो हमें ख़ुद को बदलना होगा।
समाप्त ।
Written by: Gunjan Kain
Image Courtesy: Pixabay (Artist – Clker)

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